विटामिन डी की कमी: जानने योग्य बातें
विटामिन डी की कमी एक महामारी (दुनिया भर में मौजूद) है, जिसमें से दुनिया की आधी आबादी पीड़ित है। तंदरुस्त हड्डी और मांसपेशियों के स्वास्थ्य के लिए विटामिन डी आवश्यक है। पर्याप्त विटामिन डी की मात्रा कई कैंसर, हृदय रोग और ऑटो इम्यून डिजीज का खतरा कम कर देता है।
विटामिन डी 2 और विटामिन डी 3 क्या हैं:
विटामिन डी 2 मशरूम और फोर्टिफाइड सोया दूध, बादाम दूध आदि जैसे पौधों के स्रोतों से प्राप्त होता है। यह विटामिन डी 3 से कम प्रभावी है जो सबसे सक्रिय रूप है और सूरज की रोशनी के संपर्क से त्वचा मै बनता है और, मांस, अंडे, दूध आदि जैसे पशु स्रोतों से प्राप्त होता है। सबसे महत्वपूर्ण रक्त में विटामिन डी मेटाबोलाइट 25-हाइड्रोक्सीविटामिन डी (25-ओएचडी) है। अधिकांश लेबोरेटरी खून में इसी की मात्रा को मापती है।
विटामिन डी की कमी के कारण:
25-ओएचडी (या विटामिन डी) के सामान्य सीरम मात्रा पर कोई आम सहमति नहीं है लेकिन 20 एम् जी / एमएल से नीचे रक्त स्तर को कम माना जाता है। यद्यपि नियमित सूरज का एक्सपोजर विटामिन डी के रक्त स्तर को बनाए रखने के लिए आवश्यक है; हालांकि धूप वाले देशों में भी, अध्ययनों से पता चला है कि विटामिन डी की कमी अत्यधिक प्रचलित है। यह परंपरागत कपड़ों, मौसमी भिन्नता (सर्दियों में कम विटामिन डी संश्लेषण), आहार संबंधी आदतों, उच्च अक्षांश, बुढ़ापे, मोटापे, रंग का कालापन, सनस्क्रीन उपयोग और सूर्य के संपर्क से बचने के कारण हो सकता है। एसपीएफ़ 15 के साथ सनस्क्रीन का उपयोग त्वचा में 99% विटामिन डी संश्लेषण (सिंथेसिस ) को रोक सकता है। विटामिन डी को वसा ( फैट ) में संग्रहीत किया जाता है इसलिए मोटे व्यक्ति को पतली व्यक्ति की तुलना में बराबर रक्त स्तर में वृद्धि के लिए अधिक विटामिन डी की आवश्यकता होती है।
बूढ़े लोग में (60-70 साल से ऊपर) उम्र बढ़ने की प्रक्रिया के कारण विटामिन डी की विशेष रूप से कमी होती है, क्योंकि उम्र के साथ त्वचा की विटामिन डी बनाने की क्षमता काम हो जाती है । 7-डीहाइड्रोक्लोलेस्ट्रॉल की मात्रा की कमी के कारण विटामिन डी का उत्पादन करने की त्वचा की क्षमता में कमी आती है जो एक महत्वपूर्ण है विटामिन डी संश्लेषण के लिए।
विटामिन डी की कमी के लक्षण:
विटामिन डी की कमी बच्चों, वयस्कों, वृद्ध व्यक्तियों में हो सकती है। वयस्कों में विटामिन डी की कमी के लक्षणों में थकान, सामान्य शरीर में दर्द, पैर के जोड़ो में दर्द, पीठ दर्द, मांसपेशी ऐंठन, जांघों और / या पिण्डली में दर्द, चलने में कठनाई आदि हो सकते है। बच्चे जिनमे विटामिन डी की कमी होती है उनमे “रिकेट्स” हो जाता है जो बो लेग्स(पेरो का अंदर की और मुड़ना) के रूप में पाया जाता है। सूरज की रौशनी कम मिलने के कारणवश एवं जो व्यस्क घर से कम बहार निकलते हैं उनमे विटामिन डी की गंभीर कमी के कारन ऑस्टियोमलेशिआ हो जाता है । महिलाएं जिनमे ऑस्टियोमलेशिआ होता है उनका प्रमुख लक्षण है जांघो के अंदर एवं बहार दर्द होता है जो कि जांघों कि हड्डी के स्ट्रेस फ्रैक्चर के कारन होता है ।
विटामिन डी के स्रोत:
सनलाइट एक्सपोजर (सूरज कि रोशनी) सबसे अच्छा उपलब्ध स्रोत है। अन्य आहार स्रोतों में मांस, मछली, दूध, अंडा, पनीर, मशरूम इत्यादि शामिल हैं। कुछ फोर्टिफाइड फूडस जिनमे की विटामिन डी मिलाया जाता है, जैसे कुछ नाश्ते के cereals और घी भी इसके अछे स्त्रोत है। वयस्क के लिए विटामिन डी की दैनिक अनुशंसित खुराक 400-600 IU है।
उपचार:
यदि उपरोक्त में से कोई भी लक्षण आपके स्वास्थ्य को परेशान कर रहे है तो विटामिन डी के स्तर की जांच करें। यदि यह 20-30 ng/ ml से कम है तो आपको विटामिन डी सप्लीमेंट (पूरक) की आवश्यकता है।विटामिन D3 विटामिन D2 की तुलना में रक्त मैं विटामिन डी के स्तर को बढाने में दो से तीन गुना ज्यादा प्रभावी है । उम्र 5 से कम के बच्चे और 60-70 साल से अधिक उम्र के व्यक्ति विटामिन डी की कमी होने की ज्यादा सम्भावना होती है । सर्दियों और शरद ऋतु के दौरान विटामिन डी की कमी विशेष रूप से अधिक प्रचलित है। गंभीर कमी (<10 ng/ml) का इलाज विटामिन डी खुराक के साथ किया जाना चाहिए (मांसपेशियों में 6 लाख यूनिट इंजेक्शन का एकल शॉट या 8 सप्ताह के लिए प्रति सप्ताह 60000 इकाइयों की मौखिक खुराक)| 3 महीने के लिए 1000 इकाइयों की दैनिक डोज़ भी प्रभावी होती है ।
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